बुधवार, 20 जुलाई 2016

नज़र लग गयी...

     
      एक बार मैं मेरे बॉस के साथ चाइना ट्रिप पर गया हुआ था। हम लोग शंघाई, रुयान सिटी और गुआंगझू का दौरा करने वाले थे। जब हम एयरपोर्ट पे फ्लाइट पकड़ते समय चेकिंग के दौरान बैग में का लाइटर निकाल लेते थे।  लेकिन अंदर आने के बाद मेरा बॉस मुझे कहता देख मेरा लाइटर सही सलामत हैं, और बैग से निकालकर दिखाते हुए कहता था, " देख भाई कभी भी मैं अपने पास दो लाइटर  रखता हूँ, जब भी चेकिंग में पूछता हैं मैं दो में से एक लाइटर दे देता हूँ "। 

                 थोड़ी देर में हम वेन्जु से गुआंग्झू के लिए रवाना हो रहे थे, तभी चेकिंग के दौरान  हमारे बॉस के बैग में से दोनों लाइटर निकाल लिए थे। हुआ ऐसा की बॉस ने जब एक लाइटर निकाल के दिया  तभी वहाँ के सिक्योरिटी ने दुसरा  लाइटर की मांग की। 

    बॉस ने मेरे तरफ तिरछी नज़र से देख कर कहा लगता हैं, तेरी ही नज़र लग गयी। 

गुरुवार, 14 मई 2015

सल्लू की छूटी जेल, अम्मा को हुई बेल ...

 
         क्या भारत में न्याय  मिलना इतना आसान हो गया हैं ? क्या यह न्यायपालिका अमीरों के लिए तो काम नहीं कर रही हैं? जब सल्लू मियाँ  जेल से छूटे और अम्मा को बेल मिलने का जो वाकया हमारे अदालतों ने पेश किया हैं, वो हमें इस शक की वोर ले जाता हैं की न्याय सिर्फ अमीरों को ही मिलता हैं। 

  जब अम्मा के केस में सरकारी वकील को अपना पक्ष रखने  नही दिया गया, ऐसा सरकारी वकील का कहना हैं।  जब निचले अदालत में वही केस में कैसे सजा के पात्र बने और वही ऊपरी अदालत ने उन्हें छोड़ दिया। आय से अधिक सम्पति रखना भी गुन्हा हैं।  लोग यहाँ उन्ही लोगों को सरपर  बिठा रखते हैं, और उन्हें भगवान  का दर्जा देते हैं।  
 
           ठीक हैं सल्लू मियाँ  बदल गएँ हैं, अब वो अच्छे इंसान बन गए हैं। जो लोग इस हादसे के शिकार हुए थे क्या वो बुरे इंसान थे? क्या उन्हें इन्साफ नहीं चाहिए था।  ठीक हैं सल्लू मियाँ एक फ़िल्मी हस्ती हैं ना की भगवान। लेकिन कुछ लोग कलाकार को भी भगवान का दर्जा  देते हैं। 

          अब बात पते की यह हैं की दोनों भी फ़िल्मी हस्तियाँ हैं एक पहले फिल्मो में काम कर चुकी हैं, और एक अभी भी कर रहें हैं।  

शनिवार, 10 जनवरी 2015

जरा शर्म करो 'आप' सभी...

जरा शर्म करो 'आप' सभी 
जुबान बंद होगी भी कभी 

जुबांसे  जब ये आग उगलता 
मीडिया को कुछ नहीं दीखता 
जागो  कदम उठाओ अभी 
जुबान बंद होगी भी कभी 

इसका कोई नहीं 'साक्षी'
मीडिया का तो  एक ही  साक्षी 
'साक्षी' का पीछा छोड़ो अभी
जुबान बंद होगी भी कभी  

मीडिया वालों ज़रा जागो 
जरा इसके पीछे भी भागो
हिम्मतसे दिखाओ इसे अभी  
जुबान बंद होगी भी कभी
जरा शर्म करो 'आप' सभी 
जुबान बंद होगी भी कभी

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

सुनंदा पुष्कर की मौत की कहानी ...

           
     
 दिल्ली पुलिस ने सुनंदा पुष्कर की हत्या के लिए अज्ञात व्यक्ति पे प्राथमिकी दर्ज की हैं। अब यह सवाल उठता हैं की, प्राथमिकी अज्ञात व्यक्ति के खिलाप क्यों? क्या यह सोची समझी साजिश  तो नहीं?
पुरे दुनिया को पता हैं की सुनंदा की मौत खुदखुशी नहीं बल्कि एक हत्या थी। लेकिन कानून को तो सबूत चाहियें। 

                 थोड़े दिनोंमें पता चल जायेगा की उसका हत्यारा कौन हैं? कहाँ हैं? कहते हैं की कानून के हाथ बहुत ही लम्बे होते हैं । इसी लम्बे हाथों  से उस कातिल के गलें में फास लगेगी या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा। 


 रेडियोएक्टिव पोलोनियम-210 यह एक रेडियोएक्टिव  केमिकल हैं।  एम्स रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सुनंदा पुष्कर  की मौत पोलोनियम-210 से हुई। इसका इस्तेमाल औद्योगिक कार्यों में होता है। इसकी खोज मैडम क्यूरी एंड पेरी क्यूरी दपंती ने किया था न्यूक्लियर रिएक्टर्स में यूरेनियम की केमिकल प्रोसेसिंग से पोलोनियम बनता है। 138 दिन में यह पदार्थ आधा रह जाता है। इस केमिकल का अनालिसिस भारत में  नहीं हो सकता।

पहले यह क्यों बताया  गया की मौत ओवर डोस से हुयी ?
पहले यह क्यों बताया गया की पेट में दवा मिली हैं ?
इसके लियें कौन जिम्मेदार हैं? क्या हमारा सिस्टम इतना करप्ट हो चुका हैं की, हम उसे ठीक  ही नहीं कर सकते ?

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

केम्पे गौडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा ……

     
    "नमस्कार अब हम थोड़ी ही देर में बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय हवाइ अड्डे पर उतरने वाले हैं, बाहर का तापमान २५ डिग्री सेलसियस हैं।"  अब  इस घोषणा में  थोड़ा परिवर्तन होने वाला हैं। परिवर्तन के बाद घोषणा कुछ इस तरह होगी।

 "नमस्कार अब हम थोड़ी ही देर में बेंगलुरु  के केम्पे गौडा अंतरराष्ट्रीय हवाइ अड्डे पर उतरने वाले हैं, बाहर का तापमान २५ डिग्री सेलसियस हैं।" 

क्यूँ की अब बेंगलुरु हवाई अड्डे का नाम बदलने वाला हैं जो की केम्पे गौडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा।

अब हम "केम्पे गौडा" के बारे में थोड़ा जान लेते हैं केम्पे गौडा का पूरा नाम हरिया केम्पे गौडा उनका जन्म १५१० में हुआ था और मृत्यु १५६९ में।
 केम्पे गौडा को बेंगलुरु नगर के निर्माता के रूप में जान जाता हैं। जो की उन्होंने किल्ले के बहार बड़ी सड़कें और बेंगलुरु शहर का आयोजन किया था। 

चलो अब हम मानकर चलते हैं की, अब बेंगलुरु का हवाई अड्डा केम्पे गौडा के नाम से जाना जायेगा। 

रविवार, 14 जुलाई 2013

"तार"तार हो कर टूट गयी …

 
         मैं तार बोल रहीं हूँ, एक ज़माना था जब लोग सिर्फ मेरे बल पर तत्काल सन्देश भेजकर लोग निश्चीत हुआ करते थे.   क्यूँ की मेरे बराबरी का कोई तोड़ नहीं था. मैं सब की लियें, सभी काम के लियें, काम करती थी, अब मेरा जीना मुश्किल हो गया था. क्यूँ की अब लोगों को मेरी जरुरत नहीं रही. अब इस आधुनिक युग में जहाँ  मोबाइल फोन से एस एम एस, इ-मेल यह सब पर मेरी अगली पीढ़ी ने कब्जा बनाया हैं, इस लियें अब मेरी उतनी जरूरत नहीं रही हैं. जाते जाते मैं यह कहना चाहती हूँ की, जो की मेरे काम का लेखा जोखा था जो मैं आपके साथ बाँटना चाहती हूँ. अगर किसी को शादी की बधाई, परीक्षा की सफलता या किसी की  मृत्यु यह सब समाचार तुरंत पहुचा देती थी.  


         १६२ साल  से मैं काम कर रहीं हूँ, लेकिन अब इस आधुनिक युग में मेरी धीमी चाल लोगों को पसंद नहीं हैं. आज ज़माना बहुत ही तेज़ हैं और मैं इस जमाने के साथ नहीं चल सकती इस लियें मैं इस काम से विदा ले रहीं हूँ. यह सब सोच कर मेरा दिल "तार" तार हो कर टूट गया हैं. मैं आज यानि १४ जुलाई २०१३ के बाद आपके सेवा से दूर जा रही हूँ, अब मैं सिर्फ एक इतिहास बनकर रह गयी हूँ. मेरे काम को देख कर कुछ लोग रो पड़े होंगे, कुछ लोग ख़ुशी से झूम गएँ होंगे, इसके लियें मैं सभीसे माफ़ी मंगाकर मेरी सेवा समाप्त करती हूँ. 

आभार
आपकी तार… 

शनिवार, 23 मार्च 2013

मुलायम मोम के गोंद की माया...

 
       मैं राजनीति  बोल रहीं हूँ ! मैं जीवन के जिस बुरे पड़ाव से गुजर रहीं हूँ,यह सब आपके साथ बांटना चाहती हूँ।  मैं आपको मेरे जीवन के कुछ उतार चढ़ाव के बारें में बताना चाहती हूँ। हमें 'ममता' की  ममता पर बहुत ही विश्वास  था, लेकिन क्या करे ? ' ममता' हमेंसे  ममता  किये बिना ही चली गयी।  कुछ दिन हम 'करुणा'  के दया से  चल रहे थे, लेकिन अब तो हम पर किसी की भी करुणा  नहीं आती। फिर हमने सोच लिया की, हम क्यूँ लोगों पर ममता दिखा दे, जो हमारें काम के नहीं रहें, अब  हम किसी पे क्यूँ करुणा दिखाएँ की जो हमें करुणा नहीं दिखतें? इस लिए अपना हथियार दिखाना पडा। 
   
        चलों कुछ हो ना हो 'मुलायम' मोम का गोंद बना कर  जोड़ चिपकाया  गया हैं, वो भी कितने दिन तक चलेगा पता नहीं? क्यूँ की हमने एक गलती जरुर की हैं इस 'मुलायम' मोम को हमने फेविकोल  समझ  कर चिपका तो  दिया है, लेकिन कब तक चलेगा पता नहीं। अब तो  मौसम ठंडा हैं मुलायम मोम पिघलने ने के लिए गर्म मौसम का इन्तजार हैं। जब भी मौसम गर्म होने लगेगा हमने सीबीआई का बर्फ तयार रखा हैं, क्यूँ की इस मुलायम मोम को ठंडा रखें। 

        'माया'  की बात कुछ और हैं उसे हम इस मायाजाल में इस तरह फंसाकर रखा हैं, जो की जब भी हमें लगता हैं की माया  इस मायाजाल से बाहर जाने के कोशिश करेगी तो सीबीआई के जाल में फंस जायेगी। इस लियें हम सब पर दया करुणा और ममता के बिना ही मुलायम मोम की माया के रिश्तों में जुड़ चुकें हैं, हम भी देखतें हैं की हमें कौन जुदा करता हैं ?
   
    अब मैं आपको यह बताना चाहती हूँ।  जब तक हमारें पास सीबीआई का साथ हैं, हम कुछ भी कर सकतें हैं। क्या अन्ना जैसें लोग हमें पागल समझ रखा हैं, जो  की हम हमारा हथियार किसी और को दे, नहीं !! कभी नहीं !! इसके बारें में सोचना भी नहीं। 
 
    आप लोग जरुर बताना, आपको कैसा लगा मुलायम मोम के गोंद की माया ...। 

आपकी 

राजनीति 


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