शनिवार, 18 नवंबर 2017

गुजरात का "टेम्पल रन"...


     गुजरात के  मोबाइल में टेम्पल रन गेम डाउनलोड करना था। इस लिए हमें लोकशाही के प्ले स्टोर में जा के डाउनलोड किया।


       टेम्पल रन जो गेम हैं  वो रागा  और नमो के बिच में था। लेकिन नमो इसमें शामिल  नहीं हैं।  जो भी ज्यादा टेम्पल रन करेगा उसे ज्यादा पॉइंट्स यानि वोट मिलने वाले हैं, ऐसी रागा की सोच हैं।

        जब चुनाव आयोग ने टेम्पल रन का बटन दबाया  तो रागा ने रन करते करते  इन  मंदिरों से गुजर रहा था।   टेम्पल रन  की शुरुआत की। रन... रन... द्वारकाधीश मंदिर, ... रन... रन...  कागवाड में खोडलधाम,  रन...रन ... विरपुर के जलाराम मंदिर, रन...रन ...चोटिला टेंपल  रन...रन ... राजकोट में दासी जीवन टेंपल भी पार करते हुए पहला पड़ाव पार कर गए।  अब दूसरे पड़ाव का खेल में रन...रन ...  नादियाड के शांताराम मंदिर, रन...रन ...खेड़ा के रणछोड़ राय मंदिर रन...रन ... भाठीजी महाराज मंदिर, रन...रन ... पावगढ़ में महाकाली माता मंदिर पार कर गए।


       तीसरे पड़ाव के खेल में उन्होंने दक्षिण गुजरात को पार करते करते रहें। रन...रन ...नवसारी मेंरन..रन...रन ..रन ... उनई माता मंदिर गए। टेम्पल रन में दौड़ते दौड़ते गांधीनगर में अक्षरधाम मंदिर रन...रन ...मेहसाणा में बहुचराजी मंदिर,रन...रन ...वलीनाथ मंदिर, रन...रन ...वीर मेघमाया मंदिर रन...रन ... खोडियार मंदिर में भी से होते हुए रन  कर रहें हैं। 

        अब इस टेम्पल रन में कभी "विकास" पीछे पड़ जाता हैं तो कभी हिंदू वोटों का राक्षस। अब आप ही जरा सोचियें  क्या "विकास" पागल हो गया है? जी  नहीं "विकास" पागल नहीं हुआ हैं। क्यों की "विकास "कैसा हैं यह पलट कर देख नहीं सकते, उन्हें तो सिर्फ रन...रन ... करना हैं। पीछे मुड़कर देखने का वक्त ही कहाँ है ? अगर देखे तो "विकास" रनर को  निगल जाएगा और टेम्पल रन गेम का समापन होगा। 

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

नम्मा मेट्रो में हिंदी भाषा नहीं चाहियें ...

बहुत दिनों के बाद आज "नम्मा मेट्रो"  में सफर करने को मिला ,जो बैंगलोर में  दौड़ती हैं।  जब मैं १९९६ में पहली बार बैंगलोर आया था तो तब ९ बजे के बाद पूरा बैंगलोर बंद हो जाता था।  लेकिन जो बैंगलोर की प्रगति पथ पर हैं, उसके  लिए सिर्फ आई टी इंडस्ट्री  का बड़ा योगदान हैं।  आज शहर रात भर जगता हैं, रात भर जीता हैं और यहाँ की रंगीन रातें जो किसी मेट्रो शहर से कम नहीं हैं । 

      हमें इस्कॉन टेम्पल जाना था, इस लिए हमने "बायापनहल्ली" से  "सैंडलवुड सोप फैक्ट्री "स्टेशन जाना था जो  की  इस्कॉन के  नजदीक का रेलवे स्टेशन हैं।  सिर्फ बीच में मैजेस्टिक में रूट बदलना होता हैं। 

जाते समय  मैं एक अनुभव महसूस किया जो की हिंदी अनाउसमेंट बंद हो चुका था, मुझे अब  भी  याद हैं की जब मैं पहली बार मेट्रो में सफर किया था तब तो  हिंदी में अनाउसमेंट होता था जैसा की  "अगला स्टेशन स्वामी विवेकानंद रोड हैं", मैं मन ही मन सोचा था की सिर्फ  "अगला स्टेशन स्वामी विवेकानंद रोड " सिर्फ इतना ही काफी  हैं।  

  अब तो हिंदी पूरी तरह बंद हो चुका था हर स्टेशन पर हिंदी के नेम प्लेट हटा दिए गए हैं, और कुछ जगह हिंदी नाम मिटा दिया गया हैं ।  क्या हम किसी भी भाषा की लिपि को मिटा सकते हैं,  लेकिन मन से नहीं, समाज से नहीं या देश से नहीं। हिंदी तो देश की भाषा हैं हम सबको सीखना चाहियें, किसी भी भाषा का अनादर क्यों ?

हम जिस प्रान्त में रहते हैं वहाँ की भाषा का आना जरुरी हैं, लेकिन किसी अन्य  भाषा को मिटाकर नहीं।  

ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಕನ್ನಡವೇ   ಆಢಳಿತ ಭಾಷೆ = कर्नाटकमें कन्नड़ ही अटूट भाषा। 


शनिवार, 17 सितंबर 2016

बस कंडक्टर...

             
मेरी  गाड़ी का एक्सीडेंट होने की वजह से मुझे  ड्यूटी पर BMTC के  बस  में जाना पड़ रहा था, बस स्टॉप तक मेरी बेटी के स्कूटर से छोड़ने के बाद जब मैं  ITPL लिखें हुए बस में चढ़ा, और कंडक्टर से एक बिग बज़ार जंक्शन का टिकेट देने को कहा।  जहाँ  बिग बज़ार था ही नहीं उस स्टॉप का  नाम बिग बज़ार जंक्शन था।  कुछ समय पहले सुनसान रहने वाला एरिया आज बंगलोर का आई टी हब था।  इसी जगह पर कुछ महीने पहले बिग बज़ार हुआ करता था। इस लिए इस जगह का नाम बिग बज़ार जंक्शन  था। हमारी कंपनी तो सालों  से मौजूद थी लेकिन जंक्शन नाम नहीं बन सकी।


  कंडक्टर ने टिकेट  देने के बाद कहा  "लगता हैं  आपकी कार  रेपिरिंग में हैं"?
 मेरे मन यह सवाल आ रहा था इस लिये पूछ ही लिया "हाँ, आपको कैसे पता"? 
"सर मैं आपके कंपनी में काम कर चुका हूँ"  उसने कहा।
"एक बार मैं आपको आपकी कार ड्राइविंग करते हुए होटल ताज वेस्ट एन्ड ले कर गया था उस रात एक प्रोग्राम अटेंड करना था और आपके साथ दूसरे एक सर थे।" उसने कहा। 
"कितने साल पहले की बात हैं?" मैंने पूछा। 
"तक़रीबन आठ साल पहले की बात हैं, मुझे कंडक्टर बने सात साल हो गए हैं।"  उसने कहा। 

               मुझे सब कुछ स्मरण होने लगा उतने में मेरा स्टॉप आ गया और मैं फिर मिलेंगे बोलकर बस स्टॉप पे उतर गया। हम आपने से बड़े यानी  फेमस  लोगों को याँद  रखते हैं लेकिन वही बड़े लोग हमें याँद नहीं रखते।  वक्त वक्त की बात हैं।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

एक मेडल की क़ीमत तुम क्या जानो.....

जहाँ चीन का दबदबा और जहाँ सिर्फ गोल्ड मेडल से  संतुष्ठी  मिलती हैं, जहाँ सिल्वर और ब्रॉन्ज़  मैडल की कोई कीमत नही होती। लेकिन भारत की बात कुछ और हैं। जब एक ब्रॉन्ज़ मेडल मिला तो यहाँ एक पर्व से काम नहीं हैं।

                लेकिन 132 करोर की  जनसंख्या फिर भी अब तक एक ही मेडल यह बात कुछ लापरवाही सी लगती हैं। 

               जब 1952 के सम्मर ओलम्पिक्स फिनलैंड के हेलसिंकी में आयोजित, उसमें चीन को एक भी मेडल नहीं मिला था। उस बार अमेरिका 40 गोल्ड, 19 सिल्वर और 17 ब्रान्झ, कुल 76 पदाकोंके साथ नंबर एक पर था। रूस 22 गोल्ड के साथ दुसरे नंबर पर था। और भारत एक गोल्ड और एक  ब्रान्झ के साथ 26 वे स्थान था।

     1960 का ओलम्पिक इटली के रोम खेला गया था। रूस पहले स्थान तो अमेरिका दुसरे स्थान पर था। भारत और चीन एक एक सिल्वर के साथ  32 वे स्थान पर थे।


    1964 के ओलम्पिक में भारत एक गोल्ड के साथ 24 वे स्थान पर था। इस बार चीन के ताइवान टीम को खाली  हाथ लौटना पडा। उसके बाद 1968 में भारत और  ताइवान चीन को एक एक ब्रान्झ मेडल से लौटना पडा। 1976 में चीन के ताइवान और भारत को खाली  हाथ लौटना पड़ा।

     जब 1984 में चीन 15 गोल्ड के साथ चौथे स्थान पर आ गया। भारत कोई भी मेडल नहीं ले सका।इसके बाद चीन कहता गया की रोक सके तो रोक लेना।


          अब दुनिया में चीन अमेरिका को पछाड़ने की तैयारी  में लगा हैं। क्या भारत  यह स्थान हासिल कर पायेगा ? इसके लियें  एक लम्बी और पूर्व नियोजित  योजना की जरुरत हैं, जो चीन ने अपनाई हैं।  क्या चीन के इस चौतरफा विकास को हम चुनौती दे सकते हैं?  क्या हमारी आनेवाली पीढ़ी गर्व से कह सकेगी 'मेरा भारत महान"। 


शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

कबाली एक उत्सव...

     आज २२ जुलाई २०१६ को स्पेशल क्या हैं?  हर जगह यात्रा का माहौल, जैसा की कोई उत्सव, सुबह सुबह सारे मल्टीप्लैक्स खोल दिए गए हो, जैसा की एक आनंद का पर्व, लेकिन क्या हैं यह पर्व? दोस्तों आज का खास  दिन यह हैं की सुपरस्टार रजनीकांत की कबाली रीलिज हो रही हैं। दक्षिण में यह किसी उत्सव से कम नहीं।
 
         रोज की तरह मैं ऑफिस के लियें निकल चुका था रास्ते में फोनिक्स मार्केट सिटी लगता हैं, मैं हर रोज़ ८:१५ के आस पास बंद रहता था, लेकिन आज कुछ हलचल दिखाई दे रही थी। जी हाँ यहाँ  कबाली का पहला शो सुबह ७:०० बजे शुरू हो चुका था।

              फिल्मों को इन नयी परिभाषा देने में दक्षिण के लोग सफल हो गएँ हैं, क्यूं की उनके लिए यही एक उत्सव हैं। बेंगलुरु का यह हाल हैं तो तमिलनाडु में क्या होगा?


बुधवार, 20 जुलाई 2016

नज़र लग गयी...

     
      एक बार मैं मेरे बॉस के साथ चाइना ट्रिप पर गया हुआ था। हम लोग शंघाई, रुयान सिटी और गुआंगझू का दौरा करने वाले थे। जब हम एयरपोर्ट पे फ्लाइट पकड़ते समय चेकिंग के दौरान बैग में का लाइटर निकाल लेते थे।  लेकिन अंदर आने के बाद मेरा बॉस मुझे कहता देख मेरा लाइटर सही सलामत हैं, और बैग से निकालकर दिखाते हुए कहता था, " देख भाई कभी भी मैं अपने पास दो लाइटर  रखता हूँ, जब भी चेकिंग में पूछता हैं मैं दो में से एक लाइटर दे देता हूँ "। 

                 थोड़ी देर में हम वेन्जु से गुआंग्झू के लिए रवाना हो रहे थे, तभी चेकिंग के दौरान  हमारे बॉस के बैग में से दोनों लाइटर निकाल लिए थे। हुआ ऐसा की बॉस ने जब एक लाइटर निकाल के दिया  तभी वहाँ के सिक्योरिटी ने दुसरा  लाइटर की मांग की। 

    बॉस ने मेरे तरफ तिरछी नज़र से देख कर कहा लगता हैं, तेरी ही नज़र लग गयी। 

गुरुवार, 14 मई 2015

सल्लू की छूटी जेल, अम्मा को हुई बेल ...

 
         क्या भारत में न्याय  मिलना इतना आसान हो गया हैं ? क्या यह न्यायपालिका अमीरों के लिए तो काम नहीं कर रही हैं? जब सल्लू मियाँ  जेल से छूटे और अम्मा को बेल मिलने का जो वाकया हमारे अदालतों ने पेश किया हैं, वो हमें इस शक की वोर ले जाता हैं की न्याय सिर्फ अमीरों को ही मिलता हैं। 

  जब अम्मा के केस में सरकारी वकील को अपना पक्ष रखने  नही दिया गया, ऐसा सरकारी वकील का कहना हैं।  जब निचले अदालत में वही केस में कैसे सजा के पात्र बने और वही ऊपरी अदालत ने उन्हें छोड़ दिया। आय से अधिक सम्पति रखना भी गुन्हा हैं।  लोग यहाँ उन्ही लोगों को सरपर  बिठा रखते हैं, और उन्हें भगवान  का दर्जा देते हैं।  
 
           ठीक हैं सल्लू मियाँ  बदल गएँ हैं, अब वो अच्छे इंसान बन गए हैं। जो लोग इस हादसे के शिकार हुए थे क्या वो बुरे इंसान थे? क्या उन्हें इन्साफ नहीं चाहिए था।  ठीक हैं सल्लू मियाँ एक फ़िल्मी हस्ती हैं ना की भगवान। लेकिन कुछ लोग कलाकार को भी भगवान का दर्जा  देते हैं। 

          अब बात पते की यह हैं की दोनों भी फ़िल्मी हस्तियाँ हैं एक पहले फिल्मो में काम कर चुकी हैं, और एक अभी भी कर रहें हैं।